अनमोल तोहफा-एक कहानी

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अनमोल तोहफा

दो साल पहले,घर से भागकर शादी की थी हमने ।

अपने शहर से बहुत दूर,मुंबई के एक छोटे से फ्लैट मे,जिंदगी कुछ वैसे ही गुजर रही थी जैसे एक मिडिल क्लास आदमी अपनी रोजमर्रा की जरूरते पूरी करने मे बिताता है।

अनु खुश तो थी यहाँ मेरे साथ । बस  कभी कभी अपनो का साथ न होना उसे बहुत खलता। दरअसल मैं अनु के घरवालो को बिल्कुल पसंद न था । बहुत समझाइश पर भी जब वे राजी न हुए तो हमे ये कदम उठाना पड़ा।हमारी जिन्दगी मे उभर आया ये खालिस्तान भरने की मेरी हमेशा कोशिश रहती, लेकिन मैं कभी इसमे कामयाब नही हो पाया ।

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अमीर घरों मे पले,जिन बच्चो को तमाम ऐशोआराम नशीब होते है अनु भी उन खुशकिस्मतो मे से एक थी ।अफसोस कि उसे मुझ जैसे इंसान से प्यार हुआ जिसने अपने बचपन मे सायकल तो नही, हाँ लेकिन उसका बेकार टायर खूब दौड़ाया ।

पुराना शहर छूटा तो अच्छी खासी नौकरी भी छूट गई ।कुछ महीने मुंबई की सड़के छानने के बाद यहाँ एक कंपनी मे काम मिल गया। तनख्वाह ज्यादा तो नही थी हाँ लेकिन इतनी कि हमारी मूलभूत जरूरते पूरी हो जाती । मैं इन दो वर्षो मे अनु को कहीं घुमाने लेकर नही गया,  न ही मैंने उसे कभी किसी मंहगे होटल जाकर खाना खिलाया ।सच तो ये है कि अनु ने भी मुझसे कभी इन सब चीजो की जिद की ही नही। मुझे नही मालूम उसे मुझसे कोई शिकवा है या नही लेकिन उसके हंसते मुसकुराते चेहरे ने मुझे कभी किसी कमी का अहसास होने ही नही दिया।

आज हमारी शादी की तीसरी सालगिरह है । मै अनु को बिन बताये आज के दिन उसे एक तोहफा देना चाहता था| इसलिए आज भी हर रोज की तरह अपने आफिस के लिए निकला और शाम को आफिस का काम जल्द निपटा कर  बाजार का रूख किया। मेने पिछले महीने दीवाली के बोनस मे मिले तीन हजार रूपयो से अनु के लिये बहुत खूबसूरत सोने की बालियाँ खरीद ली ।

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मैं बहुत खुश था अनु को ये जरूर पसंद आयेंगी ।मैं दुगुने उत्साह के साथ घर पहुँचा, डोर बेल बजते ही अनु ने फौरन दरवाज़ा खोला ।अंदर का दृश्य देख मैं खिल उठा, अनु ने कमरे को बेहद खूबसूरती से सजाया था । सामने मेज पे रखा केक जो अनु ने खुद बनाया था उस पर उभरे हमारे नाम आकाश-अनु बेहद प्यारे लग रहे थे । मैंने अनु को सोने की बालियाँ पहनायी ।वो मेरे इस तोहफे को देख खुशी से झूम उठी ।उसे मेरा ये तोहफा बहुत बहुत भाया उसकी आँखो मे चमक आये सफेद मोतियों ने मुझे बतलाया।

और मेरा तोहफा
स बार ऐसे नही चलेगा
( मेंने यूँ ही चुटकी लेते हुए कहा )

जी बिल्कुल
पहले अपनी आखें तो बंद करो
और अपना हाथ आगे लाओ
(अनु ने चहकते हुए कहा)

ये लो बंद कर ली आँखे
अब लाओ भी
(मेंने बेसब्र होते हुए कहा )

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उसने मेरा हाथ अपने पेट पर स्पशॆ कराते हुए कहा

आकाश हम दो से तीन होने वाले हैं ।

मेरी खुशी का ठिकाना न रहा । इतना सुनते ही मेने अनु को अपनी बाँहो मे भींच लिया ।हम दोनो की आँखो से बूंदे छलक आँयी। खुशियाँ कभी कभी आँखो के रास्ते भी आ टपकती हैं। उस शाम मैं अनु से लिपटकर बहुत देर तक रोता रहा।

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शायद अनु से मिलने वाला ये तोहफा हमारी जिंदगी मे अपनो की कमी से उभर आये खालिस्तान को कुछ हद तक तो भर ही देगा ।

बस इतनी सी ही थी ये कहानी|

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अनमोल तोहफा-एक कहानी
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