फिर बदला बदला सा हर इंसान क्यों है- एक कविता

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फिर बदला बदला सा हर इंसान क्यों है -मेरे सवाल, एक समकालीन प्रस्ठभूमि पर लिखी कविता है, जहाँ समाज में व्याप्त विभिन्न विषमताओं में बारे में कवि समाज से सवाल पूछता है. सवाल जिन्हें हम चाहकर भी झूटला नहीं सकते.  सवाल भी ऐसे जो दिल तक पहुंचकर आपको एक बार सोचने पर मजबूर कर देंगे.  इन सवालों के तानेबाने के बूनी रचना “फिर बदला बदला सा हर इंसान क्यों है ” पढ़िए और कमेंट बॉक्स में अपने विचार हमारे साथ शेयर करिए.

[ratings]फिर बदला बदला सा हर इंसान क्यों है

होंठो पर तो है हंसी
फिर आँखें नम क्यों  है
पास है हर ख़ुशी
फिर भी कुछ गम क्यों है. . .

राहें तो बहुत आती है नज़र
पर जिस पे चलना है वो अनजान क्यों है
बड़ी कठिन है सच की डगर
झूँठ की राह आसान क्यों है. . .

आज गैर अपने है और अपने गैर हो गए
समझदार होकर भी हम नादान क्यों है
पास आने की बजाय दूर हो रहे
पढ़ लिखकर भी हम अज्ञान क्यों है. . .

जन्म ले बेटा उनके घर
हर पिता का ये अरमान क्यों है
बेटिया सिर्फ दहेज़ की पहचान क्यों है
रोज़ देखते है जुल्म मासूमो पर
फिर भी हम बेजुबान क्यों है. . .

दिन रात दौड़ रहे पैसो की खातिर
खुशियाँ पैसों का मकान क्यों है
आज हर किसी की चाहत है अमीरी
ये पैसा इतना महान  क्यों है. . .

गायब सी हो गयी हमारी हिंदी भाषा
आज विदेशी भाषा होंठों की शान क्यों है
लोग कहते है हम नहीं बदले
ज़माना बदल रहा है
फिर बदला बदला सा हर इंसान क्यों है. . .

क्यों नहीं हम राम बने रहते
हर किसी में रावण जैसा शैतान क्यों है. . .

पहले कहते थे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई
आपस में सब भाई भाई
आज शक की निगाह पर
हर मुसलमान क्यों  है…..

अमन चेन और शांति
जिसके सीने में बसते थे
आज वो देश इतना परेशान क्यों है . .

फिर बदला बदला सा हर इंसान क्यों है- एक कविता
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