प्यार अधूरा ही रह जाना- एक कविता

 

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तयशुदा वक्त पर हर शाम
ो तेरा छत पर आना

बस एक झलक पाने को
बार बार घड़ी पे नजरे दौड़ाना

वो नजरे मिलते ही
तेरा यूँ घबराना

कुछ शरमाकर
वो पलके झुकाना

कुछ देर यूँ ही बेपरवाही से
उंगलियो पर दुपट्टा लिपटाना

दो जोड़ी इन निगाहो का
सबसे छुपके बस तुझे देखे जाना

और साथ खड़ी सहेली का
इशारों मे तुम्हे ये समझाना

कभी जो टकराये इत्तफाकान राहों मे
वो बाँहो से बाँहो का छू जाना

करीब से गुजरते ही
तुम्हारा मेरा बेवजह मुस्कुराना

कुछ कदम,चलते चलते ही
मुड़कर फिर नजरो का टकराना

वो छोटे से कागज के टुकड़े पर
दिल का सारा हाल कह पाना

और कभी कभी कुछ बाते
लिखते लिखते रूक जाना

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वो फूल गुलाबो के अक्सर
किताबो में ही रख्खे रह जाना

घंटो बिता कार्ड गैलरी मे
वो एक कार्ड ढूँढ लाना

कहीं तुम, ना न कह दो
यही सोच कर डर जाना

वो तीन जादुई शब्द
तुमसे कभी न कह पाना

और वो सोलह सत्रह वाला
प्यार अधूरा ही रह जाना ।

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प्यार अधूरा ही रह जाना- एक कविता
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